Friday, March 20, 2009

हम ना होंगे


फिज़ाओं में शोखी ना होगी,
फूल शबनम से नम ना होंगे,
सब होंगे तेरी महफिल में,
रौनक उसकी मगर हम ना होंगे;


एक फ़रिश्ते की शान में कभी
कसीदे हमारे कम ना होंगे,
ख्वाब देखती उन आँखों के
मालिक लेकिन हम ना होंगे;

कितने चाक लेकर उठे थे,
तुझको अफ़सोस ओ ग़म ना होंगे,
रुख उस दर का करके 'सपन'
मरने वालों में अब हम ना होंगे.

5 comments:

  1. bhai wah, kya khoob likha hai

    sab honge teri mehfil men
    raunaq, uski magar hum na honge.
    wah

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  2. एक फ़रिश्ते की शान में कभी
    कसीदे हमारे कम ना होंगे,
    ख्वाब देखती उन आँखों के
    मालिक लेकिन हम ना होंगे;

    हम न होंगे......बहूत खूब लिखा जनाब
    अद्भुद रचना, मज़ा आ गया

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  3. बहुत सुन्दर रचना
    बहुत बहुत आभार

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  4. वाह..... बहुत सुंदर रचना
    धन्यवाद ................

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  5. बहुत सुन्द रचना
    आभार.................

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