
फिज़ाओं में शोखी ना होगी,
फूल शबनम से नम ना होंगे,
सब होंगे तेरी महफिल में,
रौनक उसकी मगर हम ना होंगे;
एक फ़रिश्ते की शान में कभी
कसीदे हमारे कम ना होंगे,
ख्वाब देखती उन आँखों के
मालिक लेकिन हम ना होंगे;
कितने चाक लेकर उठे थे,
तुझको अफ़सोस ओ ग़म ना होंगे,
रुख उस दर का करके 'सपन'
मरने वालों में अब हम ना होंगे.
bhai wah, kya khoob likha hai
ReplyDeletesab honge teri mehfil men
raunaq, uski magar hum na honge.
wah
एक फ़रिश्ते की शान में कभी
ReplyDeleteकसीदे हमारे कम ना होंगे,
ख्वाब देखती उन आँखों के
मालिक लेकिन हम ना होंगे;
हम न होंगे......बहूत खूब लिखा जनाब
अद्भुद रचना, मज़ा आ गया
बहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार
वाह..... बहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteधन्यवाद ................
बहुत सुन्द रचना
ReplyDeleteआभार.................