
फिज़ाओं में शोखी ना होगी,
फूल शबनम से नम ना होंगे,
सब होंगे तेरी महफिल में,
रौनक उसकी मगर हम ना होंगे;
एक फ़रिश्ते की शान में कभी
कसीदे हमारे कम ना होंगे,
ख्वाब देखती उन आँखों के
मालिक लेकिन हम ना होंगे;
कितने चाक लेकर उठे थे,
तुझको अफ़सोस ओ ग़म ना होंगे,
रुख उस दर का करके 'सपन'
मरने वालों में अब हम ना होंगे.

